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संडे वाली चिट्ठी 20 – तुम न dear लिखो न dearest

sunday waali chitthi divya prakash dubey
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मैं चिट्ठियाँ क्यूँ लिखता हूँ ये मुझे नहीं पता। चिट्ठियाँ लिखना ऐसे लगता है जैसे इस भागदौड़ में चोरी से समय बचाकर मैं सुकून से किसी का इंतज़ार कर रहा हूँ। मैं जानता हूँ चिट्ठियों का शायद ही कोई जवाब आए फ़िर भी मैं लिखता हूँ क्यूँकि मैं इंतज़ार करने का मज़ा नहीं ख़राब करना चाहता। ये तो मेरी बात हुई आप बताइये आपने आख़िरी चिट्ठी कब लिखी थी।

 

तुम न dear लिखो न dearest, कुछ मत लिखो।

चिट्ठी लिखते लिखते इतना बह क्यूँ जाते हो फालतू में इतनी फिलोसफी झाड़ने लगते हो। सीधे सीधे सब कुछ साफ साफ नहीं लिख सकते। अच्छा तुम्हारी पिछले संडे वाली चिट्ठी मिली। तुमने लिखा था कि ज़्यादा नहीं तो चार लाइन ही लिख के भेज देना।

sunday waali chitthi divya prakash dubey

संडे वाली चिट्ठी

पहली लाइन- फटाफट अपने डाकिये को मेरी साइड से दिवाली के 101 रुपये दे देना।

दूसरी लाइन- यहाँ पर ठीक से है आशा करती हूँ तुम भी वहाँ ठीक से होगे (वैसे मैं चाहती यही हूँ कि तुम अगली चिट्ठी में लिखो कि तुम वहाँ ठीक से नहीं हो)

तीसरी लाइन- अपना लेटर पैड बदल दो और प्लीज चिट्ठी में सेंट मत लगाया करो। सेंट से तुम्हारी महक दब जाती है

चौथी लाइन- तुम्हारी चिट्ठियों का इंतज़ार करने लगी हूँ

तुम्हारी T,

PS: तुम्हारी लिखना बड़ा ही चीप लगता है। आगे से नहीं लिखूँगी तुम्हारी- वुम्हारी, चलो bye!

6- Dec- 2015


तुम्हें dear लिखूँ या dearest, ये सोचते हुए लेटर पैड के चार कागज़ और रात के 2 घंटे शहीद हो चुके हैं। तुम्हारी पिछली चिट्ठी का जवाब अभी तक नहीं मिला तो सोचा कि पिछले दिनों दिवाली की छुट्टी थी। डाकिये को मैंने दिवाली ‘का कुछ’ अलग से नहीं दिया था इस चक्कर में उसने चिट्ठी दबा ली होगी। सही कहती हो तुम फ़ोन पर कि आज कल चिट्ठियाँ लिखता कौन है। मैं भी नहीं लिखना चाहता चिट्ठी-विट्ठी लेकिन मैं इस भाग दौड़के बीच में इतमिनान से तुम्हारा इंतजार करना चाहता हूँ। चिट्ठियाँ का इंतजार तुम्हारा इंतजार लगता है। हर चिट्ठी अपने आप में एक कहानी होती है। कम से कम लिखते हुए तुम कुछ देर के लिए अपने मोबाइल का डाटा ऑफ करके सिर्फ और सिर्फ मेरे बारे में कुछ सोचती होगी। मुझे बड़ा क्यूट लगता है जब लेटर बॉक्स में चिट्ठी डालने के बाद तुम तुरंत व्हाट्स एप्प करके बताती हो कि चिट्ठी पोस्ट कर दी है और शाम को ऑफिस के बाद मैं तुमको लेने आ जाऊँ। एक ही शहर में रहते हुए लगता है कि हमने सबसे छुपाकर अपनी चिट्ठियों का एक चिड़ियाघर बना लिया है जिसकी टूटी हुई, रंग छोड़ चुकी बेंच पर तुमसे मिलकर कुछ पूरा होता जाता है। जहाँ मॉल जितनी भीड़ नहीं है। मुझे दिक्कत भीड़ से नहीं शोर से होती है। भीड़ हो शोर न हो तो मैं झेल जाऊँ। शोर में मुझे डर लगता है कि मैं तुम्हें ज़ोर से चिल्ला कर बुला नहीं पाऊँगा कोई मेरी आवाज़ दबा लेगा। मॉल मुझे मेले जैसे लगते हैं जिसमें हर बार कुछ खो जाता है। अच्छा ठीक है बस, बहुत फ़िलॉसफ़ी झाड़ ली मैंने। क्या करूँ चिट्ठियों में फ़िलॉसफ़ी ‘चल’ जाती है जैसे व्हाट्स एप्प पर जोक्स ‘दौड़’ जाते हैं। मैंने जो लिखा है वो जो कुछ भी है उसका जवाब तो क्या लिखोगी बस जो मन में आए एक चिट्ठी में लिखकर पोस्ट कर देना। चिट्ठियों में हम कोई सवाल-जवाब, हिसाब-किताब नहीं करेंगे। अच्छा ठीक है ज़्यादा नहीं चार लाइन ही सही लेकिन लिखना जरूर। चिट्ठी बैरंग भेजना, बिन टिकट चिट्ठी जल्दी और जरूर पहुँचती है। ~ तुम्हारा दिव्य

29-11-2015 2.20 AM

 

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दिव्य प्रकाश दुबे
दिव्य प्रकाश दुबे

मुसाफ़िर कैफ़े, मसाला चाय और टर्म्ज़ एंड कंडीशन अप्लाई नाम की तीन किताबें लिख चुका हूँ । कहने को एक बाप एक पति एक भाई एक दोस्त और एक टेलीकॉम कम्पनी में मार्केटिंग में काम करता हूँ। मेरी पहचान जो भी है किताबों से है और हाँ सबसे ज़रूरी बात मुझे कहानियाँ सुनने का शौक़ है। तो आप अपनी कहानी मुझे सुना सकते हैं । चिंता मत करिये मैं उसकी कहानी नहीं लिखूँगा। अगर लिख भी दी और आपका नाम नहीं डालूँगा।